धीरे धीरे सूरज गोल ,
पृथ्वी की पूरब की ओर .
लाली को बिखराता है .
सूरज ऐसे आता है .
उठ जाता है जग सारा ,
दृश्य कितना होता प्यारा .
दिन फिर सीढ़ी चढ़ता है ,
सूरज ऐसे बढ़ता है .
पृथ्वी की पूरब की ओर .
लाली को बिखराता है .
सूरज ऐसे आता है .
उठ जाता है जग सारा ,
दृश्य कितना होता प्यारा .
दिन फिर सीढ़ी चढ़ता है ,
सूरज ऐसे बढ़ता है .
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